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कद्दू जाती की फसलों में कीटों के प्रकोप की कैसे करे रोकथाम

कद्दू जाति की फसलों में कीड़ें और बिमारियों का हमला फसल की पैदावार को नुकसान पहुंचाते हैं और अगर समय पर इनका समाधान न किया जाए तो यह बहुत नुक्सान पहुंचाती है।

इस प्रजाति की फसल को लगने वाली बीमारी और कीट और उनका इलाज़ नीचे दिए अनुसार है:-

1. कद्दू का लाल कीट- जब पौधे छोटे होते हैं तो लाल कीट इस पर हमला करते हैं। अधिक हमला होने के कारण फसल बिल्कुल ही नष्ट हो जाती है। इससे बचाव के लिए फसल की बुवाई नवंबर में करनी चाहिए। कीट के हमले के समय 75 से 150 ग्राम सेविन या हेक्साविन 50 घुलनशील (कारब्रिल) को 50 से 100 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ के हिसाब से 10 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें या अंकुरण के तुरंत बाद एक बार 2.75 किलो फ्यूराडान 3 G (कार्बोफुरान) प्रति एकड़ के हिसाब से 3 या 4 सेंटीमीटर गहरे पौधों के नज़दीक डालें और उसके बाद जल निकासी करें।

2. चेपा- इसका हमला फरवरी और मार्च महीने में होता है। यह पत्तों से रस चूस लेते हैं। चेपा बहुत से विषाणु रोग फैलाता है। हमला होने पर 250 मिलीलीटर मेलाथियान 50 EC को 100 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ के हिसाब से स्प्रे करें। ज़रूरत पड़ने पर इसका छिड़काव 10 दिनों के बाद फिर से दोहराएं।

3. लाल मकोड़ा जूं- इसका हमला पत्तों पर होता है और यह पौधों से रस चूसता है। पत्तों पर जाले बन जाते हैं और पत्ते सुखकर झड़ जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए 200 मिलीलीटर रोगर 30 EC (डाईमेथोएट) या मेटासिसटाक्स 25 EC (ऑक्सीडेमेटॉन मिथाइल) को 100 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करें।

4. फल की मक्खी- यह नरम फसल में छेद करके उसे खराब कर देती हैं। इस मक्खी का अधिकतर हमला ककड़ी, काली—तोरी, करेला, घीया, कद्दू, टिंडा और खरबूज़े पर होता है। इसकी रोकथाम के लिए हमले वाले फल तोड़कर जमीन में गहरे दबा दें और Malathion 0.05% + 1% गुड़ या चीनी का घोल (20ml malathion 50ec और 200gm गुड़ या चीनी 20 लीटर पानी में) मिलाकर छिड़काव करें। यदि इसका हमला अधिक हो तो यह छिड़काव सप्ताह-सप्ताह के अंतराल पर फिर से करें। यह छिड़काव मक्की के पौधों पर, जिनकी बिजाई लगभग 8 से 10 मीटर की दूरी पर लाइन में की हो क्योंकि इन मक्खियों को ऐसे ऊँचे पौधे पर आराम करने की आदत होती है।

 

बीमारियां

1. सफेद रोग: इस रोग के कारण पौधे के पत्ते, तने और पौधे के गूदेदार भाग पर सफेद रंग का पाउडर सा दिखाई देता है। जब मौसम शुष्क हो तो यह रोग अधिक बढ़ता है। परिणामस्वरूप फल न सही होते हैं और मिठास कम होती है। इसकी रोकथाम के लिए 50 से 80 ml केराथेन 25 EC का छिड़काव प्रति एकड़ के हिसाब से करें और हर 14 दिनों के बाद फिर छिड़काव करें। पहला छिड़काव बीमारी होने पर करें।

2. पीले धब्बे का रोग: इसके हमले के कारण सबसे पहले पत्ते के नीचे धब्बे दिखाई देते हैं। पत्ते को ऊपर से देखने पर यह धब्बे पीले रंग के दिखाई देते हैं। पत्ते के नीचे स्लेटी रंग का मादा पैदा होता है। यह धब्बे बीच में से भूरे रंग में बदल जाते हैं और एक दूसरे के साथ मिल जाते हैं। पत्ता ऊपर की तरफ मुड़ जाता है। बेल जली हुई लगती है। इसकी रोकथाम के लिए फसल पर 300 से 600gm indofil M45 कवच का छिड़काव 100 से 200 लीटर पानी में प्रति एकड़ के हिसाब से फसल के विकास अनुसार करें। पहला छिड़काव अप्रैल के दूसरे सप्ताह में बीमारी शुरू होने से पहले करें। इसके बाद सप्ताह-सप्ताह के अंतराल पर 6 छिड़काव करें। बारिश के बाद छिड़काव करें। बीमारी अधिक होने पर तीसरा या चौथा छिड़काव indofil M 45 कवच की बजाए Ridomil M Z 500gm या इलियट 600 gm प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में घोलकर 10 दिनों के अंतराल पर करें। बाद में एक छिड़काव indofil M 45 कवच का 600 gm प्रति एकड़ करें।

  •   सर्दियों वाली कद्दू जाति की बेल बाद में नष्ट कर दें।
  •   अधिक सिंचाई न करें।

3. गिच्ची/गर्दन गलना: ज़मीन की सतह पर तने के नीचे वाले भाग पर भूरे और गहरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। पौधा आखिर मर जाता है या पौधे को उखेड़ा रोग हो जाता है। इसकी रोकथाम के लिए एक किलो बीज को 3gm थीरम के साथ उपचार कर बिजाई करें।

4. तना गलना: पानी भरे धब्बे तने के आसपास फैलने लगते है और वह ऊपर की तरफ बढ़कर तने को गलाने लगते हैं। इसके साथ बड़े पौधे भी गल कर मर जाते हैं और फल भी गल जाता है, जिस तरह गिच्ची/गर्दन गलन रोग में दिया गया है। बीज का उपचार कर बिजाई करें और अधिक पानी लगाने से बचें।

5. झुलस रोग: पत्ते के ऊपर धब्बे दिखाई देते हैं, जो घने भूरे होकर फिर काले पड़ जाते हैं। वह पत्तियों के किनारों से शुरू होकर गोल घेरे बनाते हैं। यदि बीमारी का हमला ज़्यादा हो तब फसल सड़ी हुई लगती है। यह बीमारी अधिकतर तरबूज पर होती है। इस बीमारी को रोकने के लिए 300gm indofil M 45 को 100 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ के हिसाब से हर 10 से 15 दिन के बाद छिड़काव करें।

6. विषाणु रोग: पत्ते गहरे भूरे और हल्के भूरे रंग के हो जाते हैं, आकार छोटा हो जाता है और कई बार सिकुड़ कर ऊँगली की तरफ हो जाते हैं। फल कम लगते हैं। इसकी रोकथाम के लिए :

  • रोग मुक्त फसल के बीज का उपयोग करना चाहिए।
  • रोगग्रस्त बेल को निकाल कर नष्ट करें।
  •   तेले की रोकथाम के लिए सिफारिश दवा का प्रयोग करें।

7. जड़ में गांठे पड़ना: फसल का कम घना होना और ठीक ना रहना, पत्ते पीले और छोटे रहते हैं। जड़ पर गांठे बन जाती है। हमले वाली बेल जल्दी मर जाती है और दिन के समय जल्दी ही मुरझा जाती है। यह बीमारी ज़मीन से लगती है। इसकी रोकथाम के लिए ज़मीन की मई-जून के महीने जुताई करें और अच्छी तरह से धूप लगाएं। बीमारी वाली ज़मीन से धान, जौ, गेहूं और तारा मीरा को फसली चक्क्र में लाएं।

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